- सच के लिए जान देने वाले पत्रकार उमेश डोभाल को नमन
- भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत चुकाई अपनी जान देकर
- उनकी विरासत आज भी युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा
{अरुणाभ रतूड़ी}:- निर्भीक पत्रकारिता की मिसाल और सच के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले पत्रकार उमेश डोभाल का स्मरण आज भी उत्तराखंड की धरती पर सम्मान और गर्व के साथ किया जाता है। 17 फरवरी 1952 को जन्मे उमेश डोभाल केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि जन-सरोकारी और साहसी पत्रकारिता का जीवंत अध्याय थे।
पहाड़ों की सादगी में पले-बढ़े उमेश डोभाल ने अपनी कलम को हमेशा सत्य और न्याय के लिए समर्पित रखा। उन्होंने कभी भी सत्ता या दबाव के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया। ‘जनस्वर’ जैसे मंचों के माध्यम से उन्होंने स्थानीय मुद्दों—भ्रष्टाचार, अवैध खनन, वन माफिया और सरकारी योजनाओं में घोटालों—को बेबाकी से उजागर किया। उनकी रिपोर्टिंग ने न केवल प्रशासनिक तंत्र की खामियों को सामने लाया, बल्कि आम जनता को भी जागरूक किया।
उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि सत्ता के गलियारों में हलचल मच जाती थी। लेकिन सच की यह राह आसान नहीं थी। लगातार मिल रही धमकियों के बावजूद उमेश डोभाल अपने मिशन से पीछे नहीं हटे। अंततः 2000 के दशक में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों के बीच उनकी हत्या कर दी गई, जिसने पूरे प्रदेश और पत्रकार जगत को झकझोर कर रख दिया।
उमेश डोभाल की शहादत यह साबित करती है कि सत्य की राह कठिन जरूर होती है, लेकिन वह कभी मिटती नहीं। आज उत्तराखंड में कई युवा पत्रकार उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और उनके आदर्शों को अपने कार्य में उतार रहे हैं।
यह समय है जब सरकार और समाज दोनों को मिलकर पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि कोई और कलम सच लिखने के कारण खामोश न हो जाए। उमेश डोभाल का बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और साहस का प्रतीक है।
जय हिंद, जय उत्तराखंड!
