अक्षय तृतीया: अक्षय सौभाग्य और समृद्धि का पावन पर्व। WWW.JANSWAR.COM

अक्षय तृतीया: अक्षय सौभाग्य और समृद्धि का पावन पर्व।

(अरुणाभ रतूड़ी):- समस्त प्रदेशवासियों को अक्षय तृतीया के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं! यह वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का विशेष दिन है, जो हिंदू पंचांग में अत्यंत शुभ माना जाता है। ‘अक्षय’ शब्द का अर्थ है ‘जो कभी नष्ट न हो’ – अर्थात् इस दिन किए गए कार्यों का फल हमेशा बना रहता है। उत्तराखंड सहित पूरे भारत में यह त्योहार धन, समृद्धि, स्वास्थ्य और सौभाग्य की कामना के साथ मनाया जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ, जो विष्णु के छठे अवतार हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों से अमृत छीना था। महाभारत में भी उल्लेख है कि इस तिथि पर पांडवों को द्रौपदी ने अक्षय पात्र दिया, जो कभी खाली न होने वाला था। उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति में यह पर्व खासा उत्साहपूर्ण है – लोग स्वर्णाभूषण खरीदते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इस दिन सोना या चांदी खरीदने से घर में लक्ष्मी का वास होता है।

सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। मिट्टी का घड़ा भरकर लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति स्थापित कर पूजन करें। चावल, दूध, दही, शहद और गुड़ का विशेष भोजन ‘पंचामृत’ बनाकर भोग लगाएं। उत्तराखंड में गेहूं, जौ या चावल से बने व्यंजन प्रसिद्ध हैं। बिना पंडित के भी पूजा की जा सकती है, जो इस पर्व की सादगी को दर्शाता है। दान-पुण्य भी अक्षय फल देता है – अनाज, वस्त्र या धन का दान सर्वोत्तम माना जाता है।

आज के व्यस्त जीवन में अक्षय तृतीया हमें सकारात्मक ऊर्जा और स्थायी समृद्धि की याद दिलाता है। उत्तराखंड जैसे क्षेत्र में, जहां कृषि और पर्यटन मुख्य हैं, यह पर्व किसानों के लिए फसल की अच्छी पैदावार की कामना का प्रतीक है। पर्यावरण संरक्षण के दौर में, प्रकृति पूजा के साथ इसे जोड़कर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को मजबूत कर सकते हैं।

इस पावन पर्व पर सभी को सुख-समृद्धि की हार्दिक शुभकामनाएं! आइए, अक्षय तृतीया के पुण्य से अपने जीवन को अक्षय बनाएं।