स्कूल की किताबें: ज्ञान का माध्यम या मुनाफे का कारोबार? WWW.JANSWAR.COM

स्कूल की किताबें: ज्ञान का माध्यम या मुनाफे का कारोबार?

(अरुणाभ रतूड़ी):- आज के समय में शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश माना जाता है, लेकिन यही शिक्षा अब कई परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है। खासकर स्कूलों की किताबों के बढ़ते दाम ने अभिभावकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ये किताबें वास्तव में कागज़ से छपती हैं या सोने-चांदी से?

साधारण कागज़ पर छपने वाली किताबों की कीमत जब हजारों में पहुँच जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। अच्छी गुणवत्ता वाले मोटे कागज़ और रंगीन छपाई के बावजूद, एक किताब की वास्तविक लागत उतनी नहीं होती जितनी उससे वसूली जाती है। फिर आखिर ये अतिरिक्त कीमत किस चीज़ की है?

प्राइवेट प्रकाशकों का दबदबा: कई स्कूल विशेष प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य कर देते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है।
कमीशन का खेल: बुकसेलर, स्कूल और प्रकाशकों के बीच कमीशन सिस्टम की चर्चाएं आम हैं।
बार-बार सिलेबस में बदलाव: हर साल नए संस्करण आने से पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं।
अनावश्यक सामग्री: कई किताबों में जरूरत से ज्यादा कंटेंट और सजावट होती है, जिससे लागत बढ़ती है।

समाज का आईना कही जाने वाली पत्रकारिता इस मुद्दे पर अक्सर खामोश नजर आती है। शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर जब आम जनता परेशान हो, तब मीडिया की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाए।
लेकिन दुर्भाग्यवश, यह विषय मुख्यधारा की खबरों में उतनी जगह नहीं बना पाता जितनी उसे मिलनी चाहिए।

सरकार को चाहिए कि स्कूलों में NCERT/राज्य बोर्ड की किताबें अनिवार्य की जाएं।निजी स्कूलों द्वारा तय की जाने वाली महंगी किताबों पर नियंत्रण और निगरानी हो। एक किताब मूल्य नियामक प्रणाली (Price Regulation System) लागू की जाए।
डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देकर ई-बुक्स और ओपन सोर्स सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

  • अभिभावक एकजुट होकर स्कूलों से सवाल पूछें।
  • अनावश्यक किताबों की सूची को चुनौती दें।
  • पुरानी किताबों का पुनः उपयोग (Book Sharing) को बढ़ावा दें।
  • शिक्षा के नाम पर हो रही इस आर्थिक लूट के खिलाफ आवाज उठाएं।

शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को ज्ञान देना है, न कि अभिभावकों की जेब पर बोझ डालना। अगर समय रहते इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में शिक्षा केवल अमीरों तक सीमित होकर रह जाएगी।

 “भारत बचाओ आंदोलन” के तहत यह आवाज सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हर उस परिवार की है जो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है।