हिमालयी जन मानस का शिव व महाशिवरात्रि-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी

 

(महाशिवरात्रि पर सभी पाठकों बधाई व शुभकामनाएं।)  

हिमालयी जन मानस का शिव व महाशिवरात्रि

 –नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी  

हिन्दुओं के तीन देवों मे से एक और उत्तराखण्ड के हिमालयी क्षेत्र के प्रमुख देवता भगवान शिव जिन्हें योग और तंत्र विज्ञान का कारक माना जाता है। शिव जी की परिकल्पना ऐसे देव के रूप में की गयी है जो क्षण में रुष्ट हो जाते हैं।रुष्ट होने पर वे और रौद्र रूप धारण कर तांडव कर देते हैं।अपना तीसरा नेत्र खोल कर कामदेव को भस्म करना इसका उदाहरण है। साथ ही वे जरा सी आराधना पर प्रसन्न होकर अप्राप्य को औढरदानी के रूप में प्राप्य कर देते हैं।                     
  वैसे तो शिव मौत के देवता हैं।अपनी मौज में आने पर वे मार्कंडेय को अमरत्व का वरदान दे देते हैं। संसार को बचाने के लिए वे हलाहल पी लेते हैं।वे व्यक्ति की आराधना देखते हैं।उससे प्रसन्न हो करवे उचित अनुचित का विचार नहीं करते।वे इतने सरल चित् हैं कि दक्षिणा में अपनी उस सोने की लंका को जिसे उन्होंने अपनी पत्नी के कहने पर स्वयं के लिए बनवाया था उस विश्रवा  ब्राह्मण को  दान दे देते हैं जिसे उन्होंने गृह प्रवेश की पूजा हेतु बुलाया था।सृष्टि में ऐसा दानवीर कोई नहीं हुआ।कई बार अपने ही वरदान से वे संकट में पड़ जाते हैं।भस्मासुर की तपस्या पर प्रसन्न होकर बिना कुछ सोचे समझे उन्होंने उसे सिर पर हाथ रख कर जलाने की शक्ति दे दी। जो उन्हें ही भस्म करने पर तुल गया। देवों के शत्रु दैत्यों,राक्षसों,असुरों को तो उन्होंने बिना किसी भेदभाव के अनेक विलक्षण शक्तियां दे डालीं।जिसका प्रयोग उन्होंने मानवता के विरुद्ध किया।                                                         श्मशान में रहने वाले दिगम्बर,तन पर भभूत मलने वाले, जटा में गंगा जी व बाल चन्द्र व गले में हलाहल गरल उगलती अहिमाला वाले शिवजी  उत्तराखण्डी जन मानस में ऐसे रचे बसे हैं जैसे मानुष तन में प्राण।यहां उन्हें एक बूढा जोगी माना जाता है।जिनकी सवारी एक बूढा बैल है।साथ में इसी हिमालय की युवती पुत्री पार्वती  पत्नी के रूप में है। जो यहां गौरा,नन्दा आदि नामों से जानी जाती है। जब वे अपने बूढे बैल में बैठ कर जग भ्रमण करते  हैं तो किसी दीन दुखी को देख कर मां पार्वती हृदय द्रवित हो जाता है। वे शिवजी को उसके दु:ख दूर करने को कहते हैं।शिव के यह कहने पर कि वह अपने कर्मों का फल भोग रहा है उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए मां पार्वती उनको अपने हठ से उस दुखियारे का दर्द दूर करने तो विवश कर देती हैं।                                                                    पार्वती ने शिव को कठोर तप से पति रूप में पाया है।एक सुकोमल सौंदर्यवती  राजकुमारी ने जितना कठोर तप उन्हें पाने में किया है वैसा तप किसी कन्या ने कभी नहीं किया होगा। पति रूप में एक ऐसे देव की चाहना जिसके तन पर व  न तो  वस्त्र, आभूषण के नाम पर सर्पों की माला,वाहन के नाम पर  एक बूढा बैल,रहने को श्मशान।सेवक भूत प्रेत,शृंगार के रूप में श्मशान की राख। तप भी इतना कठोर कि अन्न न खाकर प्रति दिन एक पत्ता खा कर जीने वाली अपर्णा।तब शिव जी  ऐसी परम वात्सल्यमयी करुणा करने वाली हर प्राणी को शिशुवत् मानने वाली पत्नी की बात क्यों न मानें।   

         शिव अनादि अजन्मा,अजर,अमर हैं उनके जन्म के बारे में पुराण भी मौन हैं  कोई उन्हें विराट खम्भ से प्रकट बताते हैं तो कोई ब्रह्मा से उत्पन्न।एक जनश्रुति के अनुसार शिव अपने विवाह के समय हुए गोत्राचार के समय अपना पिता ब्रह्मा व पितामह विष्णु को बताते हैं।प्रपितामह के बारे मे पूछने पर वह कहते हैं कि सारी सृष्टि के प्रपितामह तो वे स्वयं है।

        भृंगी ऋषि ने जब शिव परिक्रमा में माता पार्वती की उपेक्षा की तो शिव ने उन्हें अपने आधे अंग में समाकर कर अर्द्धनारीश्वर का रूप धारण कर  यह संदेश दिया कि बिना पार्वती के शिव को नहीं पाया जा सकता।  महाशिवरात्रि का त्यौहार उन्हीं शिव पार्वती के विवाह के अवसर की याद रूप  में मनाया जाता है। कहते हैं कि यह सृष्टि का पहला विवाह था जो पूरे विधि विधान से सम्पन्न हुआ। कुछ लोग महाशिवरात्रि को शिव के समुद्रमंथन से प्रकट हलाहल पान से जोड़ते हैं। हलाहल से उपजे दाह को शान्त करने के लिए उनपर  जल,दूध व बिल्वपत्र चढाते हैं।                    महाशिवरात्रि मनाने के बारे में एक आख्यान है कि एक आखेटक (बहेलिया,शिकार वृत्ति वाला) शिवरात्रि के दिन भर शिकार न मिलने से रात होने पर एक बिल्व वृक्ष पर चढ गया। संयोग से उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था।अनजाने ही उस बहेलिया के द्वारा फेंके गये बेलपत्र उस शिवलिंग पर गिरते रहे।इससे प्रसन्न हो कर शिव जी ने उसे यह कहकर मोक्ष दे दिया कि आज महाशिवरात्रि को जो भी जीव शिवलिंग पर बेलपत्र व जल चढाएगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी।

           इसके अतिरिक्त एक कहानी और है शिवरात्रि के दिन  एक बहेलिया एक हिरनी को मारना चाहता था हिरनी ने बहेलिया से विनती की कि वह उसके नवजात शावकों से मिलने जाने दे।बहेलिया ने उसे जाने दिया हिरनी अपने बच्चों के पास गयी और उन्हें  सारी बात बतायी।मां के साथ बच्चे भी शिकारी के पास आये ।यह देख शिकारी के मन दया उपजी उसने उन्हें छोड़ दिया। उसकी यह दयालुता देख कर भगवान शिव ने उन्हें मृगसिरा नक्षत्र के रूप में आकाश मेँं स्थिर कर दिया।                                                               महाशिवरात्रि को हिन्दू भक्त स्नानादि से निवृत होकर निराहार रहकर शिव मंदिर में बेलपत्र व दूध व जल चढाते हैं।रात भर को शिव कीर्तन कर जागरण करते हैं।

महाशिवरात्रि पर सभी पाठकों बधाई व शुभकामनाएं।  -संपादक

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