राज्य स्थापना दिवस पर विशेष-बीस सालों में राज्य में जहां भ्रष्टाचार बढा है वहीं विकास भी हुआ है।पढिए Janswar.Com में वरिष्ठपत्रकार नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी का लेख।

 राज्य स्थापना दिवस पर विशेष

बीस सालों में राज्य में  जहां भ्रष्टाचार बढा है वहीं विकास भी हुआ है।

लेख-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बीस साल में हमने जहां कई नयी सड़कों,संचार,तहसीलों,उप तहसीलों, नगरनिगमों, नगरपालिकाओं व नगरपंचायतों को पाया है वहीं कई ग्राम सभाओं को खोया हैं।इस अवधि में एक भी नया जनपद,नया ब्लॉक गठित नहीं कर पाये।हमने अपना मूल निवास प्रमाणपत्र का अस्तित्व खोया है उसके स्थान पर अधिवास का बनवाने को मजबूर हुए हैं।हमारे जन प्रतिनिधि भ्रष्टाचार के मामले में अधिकारियों- कर्मचारियों  पर  अंकुश लगाने में कमजोर साबित हुए हैं। कुछ मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों  पर अपने रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे हैं, तथा कुछ पर चारित्रिक अभियोग भी लगे हैं।कई ऐसे अधिकारियों को शीर्ष पदों पर बैठाया गया है जिन पर घोटालों,भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।इन में से एक सद्य सेवानिवृत अधिकारी पर तो झारखंड में उनके कार्यकाल के भ्रष्टाचार पर सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की है।बाहरी प्रदेशों के लोगों का दबदबा बढा है। चार मुख्यमंत्री देने वाले जनपद पौड़ी गढवाल की निरंतर उपेक्षा हुई है।मंडल मुख्यालय पौड़ी कैम्प कार्यालय बन कर रह गया हैं। 

  एक दो मुख्यमंत्रियों को छोड़कर लगभग सबने राज्य निर्माण के सेनानियों की निरंतर उपेक्षा की है। उनको सम्मान देने के लिए कोई भी कानून सरकार नहीं बना पायी है।जो कुछ भी है वह शासनादेशों  के माध्यम से है।जिसमें शासन के अधिकारी निरंतर परिवर्तन करते रहते हैं। आन्दोलनकारियों को दस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने के शासनादेश पर  उच्च न्यायालय ने जो रोक लगायी थी उसे तत्कालीन सरकार ने कोई चुनौती देने कीवआवश्यकता ही नहीं समझी।उच्च न्यायालय ने तो राज्य आन्दोलनकारियों को (राबड़ी) उपद्रवी  तक कह दिया था जिसके विरुद्ध सरकार ने अपील नहीं की पर कुछ आन्दोलनकारियों ने,जिनमें श्री रविन्द्र जुगराण व ऐडवोकेट रमनशाह मुख्य हैं, इसे चुनौती दे कर बड़ी अदालत से हटवाया। सरकार ने दस प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के लिए विधान सभा में विधेयक पारित करवाया पर  राज्यपाल ने उस पर न तो हस्ताक्षर किए और न उसे वापस ही किया। जहां पूर्व की सरकारों ने सात दिन से अधिक  जेल में रहने वालों  को पेंशन दी वहीं  हरीश रावत सरकार ने सभी राज्य आन्दोलनकारियों को, जिनको कोई सरकारी पेंशन नहीं मिलती, उन्हें पेंशन की व्यवस्था कर उनका सम्मान किया है।

 सबसे दुखद बात यह है कि राज्यआन्दोलन में हुए शहीदों को अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है।उत्तरप्रदेश की सपा सरकार ने तो उन हत्यारों का बचाव किया ही वहां की भाजपा सरकारों ने भी उन्हें संरक्षण दिया है। विडम्बना तो यह रही कि उत्तराखण्ड की किसी भी सरकार ने शहीदों को न्याय दिलाने के लिए कोई पहल ही नहीं की हैं।उत्तराखण्ड राज्य निर्माण शहीदों को न्याय दिलाने के लिए देश की सबसे बड़ी जांच ऐजेंसी सी.बी.आई. भी नाकाम रही है।

     राज्य बनने  हमें आशा थी कि हर जिला मुख्यालय व ब्लॉक मुख्यालय के बीच रोड़वेज सेवाओं के माध्यम से जुड़ाव होगा पर परिवहन निगम के नाकारा अधिकारियों ने घाटे के नाम पर उन सड़कों से भी रोड़वेज की सेवाएं हटा दीं जहां साठ के दशक से रोड़वेज चलती थीं।आज पहाड़ का पूरा यातायात प्राईवेट मैक्स गाड़ियों पर प्राईवेट बस कंपनियों पर निर्भर है जिन पर न तो अधिकतम सवारी ढोने की बंदिश है न निर्धारित किराया लेने की बंदिश।जिसका नतीजा आये दिन सड़क दुर्घटनाओं का होना है पर परवाह किसको है?

      सभी सरकारें  पलायन पर चिन्ता जताती है पहाड़ों के खाली होने पर घड़ियाली आँसू बहाते हैं पर कोई यह नहीं बताता कि राज्य बनने के बीस साल बाद भी  जब ऐक्सरे अल्ट्रासाउण्ड खून की जांच के लिए जब शहर की ओर भागना है तो हर आदमी यही सोचता है कि शहर में ही क्यों न रहा जाय।क्योंकि यहां अस्पतलों के भवन तो हैं पर उनमें ऐक्सरे व अल्ट्रासाउण्ड मशीने नहीं हैं न खून की जांच जैसे मूलभत सुविधा अगर यह सुविधा हैं भी तो डॉक्टर, टेक्निशियन नहीं है ।जहां मशीनें भी हैं और टाक्टर टेक्निशियन भी  नियुक्त हैं तो कई जगह यह  उपस्थित नहीं होते। इसे देखने वाला कोई नहीं है।

 पहाड़ी गांवों में प्रधान से लेकर जिलापंचायत सदस्य तक  प्रवासी  निर्वाचित होते हैं।क्योंकि उनके धनबल,छलबल के आगे स्थानीय निवासी नहीं टिक पाता।कई जगह तो एक ही प्रवासी परिवार  ऐसे कई पदों पर कब्जा जमाए बैठे हैं।जिससे परिवार का तो विकास होता है पर क्षेत्र का विकास नहीं हो पाता।

    विद्यालयों, विभागों से जो अधिकारी कर्मचारी,अध्यापक स्थानान्तरत/पदोन्नत/सेवामुक्त हो रहे हैं उनके स्थान पर नये नहीं आते जिससे स्वाभाविक रूप से जनसेवा कार्य में शिथिलता आती है। कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है।पर परवाह किसे है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी कार्य होते हैं उनकी गुणवत्ता सही नहीं होती। पूछने पर पता लगा कि यह सब भारी कमीशन के कारण हो रहा हैअब इसमें सच्चाई कहां तक है कहा नहीं जा सकता पर घटिया गुणवत्ता वाले कार्य पास कैसे हो पाते हैं यह विचारणीय प्रश्न हैं। जनता कृषि भूमि की पैमाईश व चकबंदी के इन्तजार में बैठी है।गुलदार,भालू,हाथी,बन्दरों से त्रसित है।कृषि क्षेत्र घटा,जमीनों के दाम बेहताशा बढे।पहाड़ों में कृषि जमीन बंजर हुयी है।

  एक पत्रकार व एक राज्य आन्दोलनकारी की हैसियत से  निष्पक्ष कहूं तो उत्तरप्रदेश में अधिकारियों कर्मचारियों में जो राजभय दिखता था वह अब कहीं नहीं दिख रहा है। इसीलिए नकली डिग्री के मास्टर,छात्रवृत्ति घोटालाआदि घोटाले उजागर हो रहे है।मुख्यमंत्रियों के विरुद्ध स्टिंग ऑपरेशन हो रहे हैं।सरकार के विरुद्ध लिखने पर पत्रकारों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में ठूंसा जा रहा है।जिनकी एफआईआर उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त की जा रही है।विभिन्न आयोग सेवानिवृत नौकरशाहों को रोजगार देने के माध्यम बने हैं। अपनी पार्टी के लोगों को दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री, निगमों व बोर्ड अध्यक्षों के रूप में राजकोष से उपकृत करने की प्रथा का प्रचलन हुआ है।

 शहरों  में भी चेन स्नेचिंग,शराब तस्करी,नशे के कारोबार,जमीन घोटाले,सरकारी संपत्तियों पर कब्जा,आदि सामने आरहे हैं।पक्की गलियों को उखाड़ कर उनको पुन: बना कर धन का दुरुपयोग किया जाता है। रेत बजरी पर सत्ता दल के लोगों का परोक्ष नियंत्रण होता है।

जनता बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह उगे क्लीनिकों में इलाज करने को मजबूर हैं क्योंकि सरकारी अस्पतालों में  संसाधनों की कमी होने के साथ-साथ दूर दूर  के ग्रामीण आबादी का दबाब भी है।ऐसे में उनकी सारी व्यवस्था लड़खड़ा जाती है।

राज्य बनने से सत्ता मे व सत्ता के निकट के लोगों का  पद,कद,धन- सम्पत्ति बढी है।अधिकारियों कर्मचारियों के वेतन भत्तों में आशातीत वृद्धि हुई है।सबसे बड़ी बात राज्य में अधिकारियों की फौज बढी है।जबकि कर्मचारियों के पदों में निरंतर ह्रास हुआ है।

   इन बीस वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों मे वृद्धि हुई है। टिहरी बाँध में बिजली बननी प्रारंभ हुयी।नदियों पर नये पुल बने।जिससे यातायात सुगम हुआ।ऋषिकेश बद्रीनाथ,ऋषिकेश-गंगोत्तरी ऑलवेदर रोड़,ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाईन बनने से जहां ये सामरिक महत्व के लिए उपयोगी है। वहीं स्थानीय  लोगों व यात्रियों  को यातायात की सुविधा उपलब्ध कराएंगे। गैरसैंण में विधानसभा भवन बना,तथा गैरसैण ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हुई। जिस पुलिस विभाग में उत्तराखण्ड के लोगों को बहुत कम अवसर मिलता था उसमें अब निचले पदों पर उत्तराखण्डियों की बहुलता है।

 संक्षेप में उत्तराखण्ड बनने के बाद राज्य में भ्रष्टाचार के बढने के बाद भी विकास हुआ है इसमें कोई संदेह नहीं है।

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