मकरसंक्राति-काले कौआ काले! घुघती माला खाले !!पढिए Janswar.com में।

मकरसंक्राति-काले कौआ काले! घुघती माला खाले !!

लेख-अरुणाभ रतूड़ी (संपादक -जनस्वर डॉट कॉम पोर्टल)

संपादक

भारतीय जोतिषशास्त्रों में बारह राशियां मानी गयी हैं.प्रत्यक्ष देव सूर्य इन राशियों में क्रमश: भ्रमण करते हैं।वह प्रत्येक राशि में लगभग 30 दिन तक रहते हैं जिसे माह कहते है.सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश काल को संक्रांति कहते हैं जो सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक रहती है।जो 60घटि या 24 घंटे होते हैं इस साठ घटि या 24 घंटे की अवधि को दिन कहते हैं।इस प्रकार सूर्य के दूसरी राशि के संक्रमण से अगले सूर्योदय को माह का पहला दिन होता है.भारतीय माहों के नाम नक्षत्रों के नाम पर रखे गये हैं जैंसे चित्रा -चैत्र,विशाखा -वैशाख,जेष्ठा-जेठ आदि। भारतीय जनमानस में संक्रांतियों को बहुत पवित्र माना जाता है। पुण्यकारी व व मोक्षकारी माना जाता है। भारतवर्ष की स्थिति 8°4’उत्तरी अक्षांश से प्रारंभ 37°6′ उत्तरी अक्षांश के बीच है।कर्करेखा इसके मध्य से हो कर गुजरती है। भूमध्य रेखा से दूरी के कारण इसके उत्तरी भाग में कड़ाके की ठंड पड़ती है।जो नवम्बर से प्रारम्भ होती है और लगभग फरवरी मध्य तक रहती है।यद्यपि दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में दिन बढने लगते हैं पर वास्तविक रूप से उनके बढने का अहसास मकर संक्रांति से ही होता है। सूर्य जब पौष माह के अपने सबसे कम तेज के बाद धनुराशि को छोड़कर मकरराशि में संक्रमण करते हैं तो पूरे भारत में एक उत्साह सा छा जाता है। सूर्य के मकरराशि में प्रवेशकाल को मकरसंक्रांति कहते हैं। याने मकर रेखा से सूर्य उत्तरीगोलार्द्ध की ओर बढने लगता है।इसलिए इसे उत्तरायण कहते हैं।इस उत्तरायण में लोग धार्मिक कार्य प्रारम्भ करते हैं। इस दिवस को भारत में उत्सव के रूप में मनाते हैं.इसदिन सूर्य के उत्तरीअयन (उत्तरी गोलार्द्ध की ओर उन्मुख होने) पर इस दिन से माघमास का प्रारंभ होता है. भारत के विभिन्न राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। उत्तराखण्ड में इसे मकरैणी, खिचड़ी संग्रांद, उत्तरैणी, उत्तर प्रदेश,बिहार में खिचड़ी,मकरायणी,हिमाचल में माघी,माघसाजी, पंजाब व हरियाणा में लोहड़ी, माघी, कश्मीर में शिशुर संक्रांति,कर्नाटक में मकर संक्रमण,तमिलनाडु में पोंगल,ओडीसा में मकरचुला,कर्नाटक में सुग्गी,आसाम में भोगल माघबिहू आदि कहते हैं। भारत ही नहीं भारत के बाहर भी मकरसंक्रांति बहुत धूमधाम से मनायी जाती है नेपाल में इसे माघा संक्रांति,खिचड़ी संक्रांतिं,बांग्ला देश में पौषसंक्रांति,थाईलैंड में सौंगकरन, मांम्यार में थियान,लाओस में पि-मा-लाओ,कम्बोडिया में मोहा संक्रान,श्रीलंका में पोंगल,उझवर तिरुनल कहा जाता है इस मकर संक्रांति के साथ कुछ पौराणिक कहानियां भी जुड़ी हैं.कहते हैं कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं(सूर्य मकर राशि में जाते हैं और मकर राशि के स्वामी शनि होते हैं।) एक और पौराणिक आख्यान के अनुसार इसी दिन गंगा जी भगीरथ के पुरखों को तार कर पहली बार सागर में मिली थी. उत्तराखण्ड कुमांयु मंडल में इसे घुघती त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। इसदिन बच्चे अपने गले में पकवानों की माला बांध कर काले काले कह कर कौवों को बुलाते हैं और उन्हें पकवान खिलाते हैं। इसके पीछे भी एक कहानी है कि कुमांयु के राजा कल्याण चंद का बड़ी आयु में भगवान बाघनाथ के आशीर्वाद से एक बेटा हुआ। जिसे रानी ने प्यार से घुघती कहती थी। घुघती के गले में मोती की माला थी जिसपर छोटे छोटे घुंघरू बंधे थे। बच्चे को माला बहुत प्रिय थी।जब भी वह जिद करता तो रानी उससे कहती कि अगर वह जिद करेगा तो माला कौवों को दे देगी।बच्चे को डराने को कहती काले कौवे काले घुघती माला खा ले। रानी के यह कहने पर वहां कौवे आ जाते जिन्हें रानी व घुघती खाने की चीजें देते थे इससे कौवों और घुघती में दोस्ती हो गयी। राजा का मंत्री घुघती के जन्म से पहले राजगद्दी पर नगाह टिकाये बैठा था पर राजकुमार के पैदा होने से उसे अपने हाथ से राजगद्दी निकलना अच्छी नहीं लगा। वह उस बच्चे को मारकर स्वयं राजा बनना चाहता था। एक दिन उसने बच्चे का अपहरण करवा कर उसे जंगल में ले जाकर मारने की योजना बनायी।जब मंत्री के आदमी बच्चे का अपहरण कर रहे थे तो एक कौवे ने उन्हें यह करते देख कांव-कांव कर अन्य कौवों को बुलाया। सारे कौवे अपहरणकर्ताओं के ऊपर मंडराने लगे।मंत्रीं के आदमी घुघती को लेकर जंगल में ले गये जहां मंत्री उनकी प्रतीक्षा कर रहा था.जैसे ही मंत्री ने राजकुमार को मारना चाहा तो वैसे ही कौवों की फौज ने उनपर आक्रमण कर पंजों व चोंच मार-मार कर उन्हें बच्चे को छोड़ कर वहां से भागने को विवश कर दिया।एक कौवा बच्चे की माला लेकर रानी के पास गया और उसके सामने माला गिरा कर उसे अपने साथ आने का इशारा करने लगा। राजा रानी और सैनिक उस कौवे के पीछे-पीछे जंगल में गये।वहां उन्हें राजकुमार एक झाड़ी के नीचे सोते हुए मिला, जिसकी रक्षा में सैकड़ों कौवे पेड़ों-झाड़ियों में बैठे हुए थे। राजमहल लौट कर राजा ने मंत्री व उसके साथियों को मृत्युदण्ड दिया। रानी ने बहुत सारे पकवान बना कर कौवों को खिलाये।वह हर साल मकरसंक्रांति को ऐसा करती थी। घीरे-धीरे सारे कुमांयु में यह त्यौहार मनाए जाने लगा। इसी प्रकार पौड़ी गढवाल के निचले भाग में इसे गेंद मेला कहते हैं। यमकेश्वर तहसील के उदयपुर अजमीर पट्टियों की सीमा थलनदी व यमकेश्वर ब्लॉक में यमकेश्वर, किमसार, त्यौड़ोंगाड, दुगड्डा ब्लॉक की अजमीर पट्टी में मवाकोट,द्वारीखाल ब्लॉक कीग लंगूर पट्टी में डाडामंडी व ढांगू पट्टी में कटघर में गेंद खेलकर यह उत्सव मनाया जाता है जिसमें दो दल एक बड़ी चमड़ामढी गेंद को हाथों से खींच कर अपनी सीमा में ले जाने का प्रयास करते हैं जो दल अपनी सीमा में गेंद खींच कर ले जाता है वह जीत जाता है। इस खेल का प्रारम्भ थलनदी से हुआ।बाद में यह और जगह भी खेला जाने लगा। यह खेल कब से प्रारम्भ हुआ कैसे हुआ कोई नहीं जानता है। इस प्रकार मकरसंक्रांति का भारत ही नहीं दक्षिणपूर्व एशिया में भी महत्वपूर्ण स्थान है वास्तव में सूर्य का मकरराशि में प्रवेश इस क्षेत्र में शीत से मुक्ति व बसंत के आहट का प्रतीक है। इस दिन खिचड़ी तेल,घी,गुड़ आदि खाया जाता है तथा नदियों में स्नान किया जाता है। माघ के पूरे महीने में नदियों स्नान व दान करने से पुण्य मिलता है तथा शनिदेव प्रसन्न रहते हैं

आप सभी को मकरसंक्रांति की बहुत-बहुत बधाई।

जनस्वर डॉाट कॉम परिवार

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