प्रशान्त मैठाणी की फेसबुक वॉल से-यमकेश्वर विधानसभा से एक आम मतदाता की मार्मिक अपील -www.janswr.com

यमकेश्वर विधानसभा से एक आम मतदाता की मार्मिक अपील -प्रशान्त मैठाणी

मुझे बहुत अच्छे से याद है में जब वर्ष 2000 में कक्षा 06 में पढ़ता था, तब मेरे बहुत से रिश्तेदार और कही लोग जब घर आते थे या फिर कही बार घर में बड़े बुजुर्ग चर्चा किया करते थे, की लोग हमे बहुत भाग्यशाली मानते हैं, क्योंकि हमारा गांव (झेड़, विजयपुर) सड़क से मात्र 05- 06 किलोमीटर की पैदल दूरी पर था. उसी वर्ष 2000 में हमारा देवभूमि उत्तराखंड राज्य का जन्म हुआ. आज 22 साल राज्य बने हो गए हैं हम आज भी वही पैदल 05-06 किलोमीटर पैदल मार्ग से जाते है. अस्पताल की तो बात ही क्या करनी है. पढ़ाई हेतु शहर आए, पर गर्मी या सर्दी की छुट्टी में गांव जाना होता रहता था, मुझे बहुत अच्छे से याद है गांव में जब कोई बीमार हो जाता था तो उसे चारपाई या कुर्सी के सहारे, पगडंडी से भी छोटे रास्ते से मुख्य सड़क पर लाया जाता था. हमारा गांव ऋषिकेश से ज्यादा अधिक दूरी पर नही है. आज भी गांव के लोग गैस सिलेंडर या फिर कुछ भी जरुरी सामान अपने सिर पर पैदल ही लाना है। वर्ष 2000 के बाद हमारे क्षेत्र से विधायक और सांसद निर्वाचित होकर आए, जिनको मेरे गांव वासियों ने भी वोट दिया। अगर में अपने गांव से किसी भी दिशा में देखता हूं तो हर उस गांव में रोड आ जा चुकी है जहां के लोग हमें सौभाग्य शाली घोषित करते थे। सच बताए तो हमारे गांव के लिए आज तक उत्तराखंड राज्य ही नही बना, क्योंकि जो गांव जाने के रास्ते वर्ष 2000 में ठीक ठाक स्थिति में थे आज वो भी उस स्थिति में भी नहीं है। बड़ी मुश्किल से एक सड़क पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में स्वीकृति हुई, जो अनेक चरणों में होकर वर्ष 2019 तक कही गांव तक पहुंच पाई, तो दूसरी तरफ से आने वाली रोड 07 साल से 02 किलोमीटर तक नही बढ़ पाई, जो सड़क 2019 में पहुंची, उस पर बहुप्रतीक्षित #सिंगटाली मोटर पुल निर्माण होना था जो सीधे हमारे गढ़वाल मंडल से बिना उत्तर प्रदेश गए सीधे कुमाऊं मंडल को जोड़ता, पर 2020 में उस मोटर पुल को ही निरस्त कर दिया गया । क्षेत्र के लोगों की विरोध और एकजूटता के बाद मोटर पुल का पूर्व चयनित स्थान हेतु शासनादेश जारी तो हुआ, पर उस से आगे कुछ भी नही हुआ। #सिंगटाली मोटर पुल के लिए चाहे पक्ष हो या विपक्ष सबके दरवाजे खटखटाए, एक से बढ़कर एक नेताओं के वादे देखे। खैर आज भी 05 से 06 किलोमीटर पगडंडी से भी बेकार रास्ते से जाना होता है। उम्मीद है आगे मेरे गांव के लिए भी कोई जनप्रतिनिधि सोचेगा, जितना में समझा यमकेश्वर विधानसभा को सदैव स्वर्गाश्रम, जोंक गांव, लक्ष्मणझूला या फिर रोड के नजदीक कोई गांव तक ही देखा गया, इस विधानसभा की भौगोलिक विविधता काश कोई समझ पाता। न जाने मेरे जैसे कितने लोगों की ये कहानी होगी। अब आने वाले समय में जब गांव खाली हो जायेंगे तब के लिए पंक्ति याद आती है
सड़क तुम अब आई हो गाँव, जब सारा गाँव शहर जा चुक़ा है।

(साभार)

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