पिता की मृत्यु पर एक बेटे के उद्गार।Janswar.com

सौभाग्य रहा मेरा कि आप मेरे पिता जी हैं (थे)।

सौभाग्य रहा पिताजी आपका कि आपके संस्कार हम मान रहे हैं।
शायद दुर्भाग्य ही रहा आपका पिताजी कि हम ऐसी सन्तान रहे कि आपको बचा न पाए, आपके लिए कुछ न कर पाए।

पिताजी आप श्री तुलसीराम कपरूवान जी का जन्म 13 अप्रैल 1957 को यमकेश्वर प्रखंड के पट्टी तल्ला उदयपुर के पैंया गाँव में हुआ था। 4 भाइयों और 3 बहनों में से छठा नम्बर आपका था आपके बाद 1 छोटी बहन थी।
दादा जी नाड़ी वैद थे, जो कि नाड़ी देखकर ही रोग की पहचान कर लेते थे,प्राचीन समय मे जब सड़क नही थी तब ग्रामीण क्षेत्रों के लिए वैद ही बीमार लोगों का उपचार किया करते थे,और यहां तक कि साइटिका,सुगर,पेट सबन्धी रोग,अल्सर जैसे रोगों का उपचार यहां हुआ करता था। आपने दादा जी से सीखकर आज भी डेंगू,सुगर,साइटिका,पेट का बुखार,लकवा जैसे गंभीर बीमारियों की आयुर्वेदिक दवाइयां निशुल्क दिया करते थे। लेकिन खुद की लाइलाज इस कैंसर रूपी बीमारी का इलाज आप न कर पाए।

22 अक्टूबर को हम अस्पताल गए थे वहां Dr.ने कैंसर के लक्षण बताए थे,हम तुरन्त 23 अक्टूबर को ऋषिकेष aiims अस्पताल चले गए थे,जांचें शुरू हुई 24 को आपकी बायोप्सी हुई शाम को रिपोर्ट में कंफर्म हुआ कि आपको 2nd stage का कैंसर है जिसका कि इलाज संभव था जो नियंत्रण में था तो Dr. के कहने पर कीमो की तैयारियां शुरू हुईं, हमने तेजी से अन्य जरूरी जांचे करवा कर कीमो करवाना था लेकिन आपको असहनीय दर्द हुआ तो Dr ने जांच की तो मालूम हुआ कि कैंसर चौथे stage में पहुंच चुका है जो कि मेडिकली इलाज के दायरे से बाहर था। लेकिन आपको गले मे स्वांस नली और खाने की नली दोनों में बीमारी की गंभीरता को देखते हुये आनन फान में एडमिट किया गया। आपके शरीर की सभी जांचे फिट रही। Dr भी अचम्भित थे कि यह पूरे फिट हैं तो बीमारी किसको है!
आपको 63 वर्ष की उम्र तक जीवन मे कभी सरदर्द बुखार तक नही हुआ न कभी Dr की दवाई खाई, बस समय समय पर आप घरेलू जड़ी बूटियों को कूटकर उनका रस बनाकर पी लेते थे जो कि कई अज्ञात बीमारियों की समाप्ति स्वतः ही कर देती थी। अब मानसिक रूप से तैयार होना था तो सम्बन्धित dr के पास गए उन्होंने कहा कि आपकी ऑपरेशन में आवाज जा रही है क्या आप तैयार हैं? पापा का चेहरा उतर गया था क्योंकि यह बात मैंने भी पापा जी से आजतक छुपाई थी।
उन्होंने मेरी तरफ देखा मैं भावुक होकर वहां से बाहर आ गया और गेट में खड़ा होकर मैंने सुना कि पापा कह रहे हैं कि ऐसा इलाज करो कि आवाज न जाये नही तो क्या फायदा जब आवाज नही रहेगी तो।
आपसे छुपकर मैं रोता रहता था जो शायद आप भी जानते थे, दुनिया मे इस तरह आपसे प्रेम और आपकी इतनी फिक्र करने वाला शायद मैं ही था।
खैर अस्पताल में dr ने अपना काम करना था ऑपरेशन की तैयारियां पूरी हुई 28 नवम्बर से 9 दिसंबर तक आज-कल करके ऑपरेशन का समय दिया जा रहा था। सबसे अच्छी बात यह भी रही कि आपका इलाज कैंसर विभाग के विभागाध्यक्ष के निगरानी में हो रहा था। जो हर साधारण ब्यक्ति के भाग्य में नही होता। aiims के Dr ने शरीर,उम्र और गले जैसे महत्वपूर्ण अंग को देखते हुये कहा कि आपका ऑपरेशन नही हो सकता और हमको अन्य विकल्प देखने को कहा, Dr तो सब जानते थे। बस हम ही नही जाने कि आप इतने कम समय के मेहमान हैं हमें पूरी आशा थी कि हमने आपका इलाज करके आपको स्वस्थ करना है हम आपको 300 किमी दूर हिमांचल सोलन ले गए जहाँ चैल नामक जगह पर केवल कैंसर के लिए आयुर्वेदिक दवाई दी जाती है, और यहाँ से पीड़ित ठीक भी हुये हैं हमने वहां वैद को दिखाया तो वह बोले कि कोई बड़ी बात नही है सब ठीक हो जाएगा हमारी दूसरी तरफ ख़ुशी आ ठिकाना नही रहा कि हम सब खुश थे कि भगवान ने यहाँ रास्ता खोल दिया है। हम हर 10 से 15 दिन में यहाँ दवाई लेने जाने लगे थे इस बहाने पापा का ध्यान भी बंट रहा था वह भूल रहे थे कि मैं बीमार हूं।और घूमना भी हो रहा था नई जगह पर, आप तो अपने जीवन काल मे यहां कुछ दिन रहे भी,यात्रा में कभी कभार असहनीय दर्द के कारण कराह उठते थे हमारे पास उनको ढांढस बंधाने के सिवाय कोई भी विकल्प नही था, कभी ऊंची आवाज में आपको बोला भी कि पापा जी आप धैर्य बनाये रखो हम सही जगह हैं और सही जगह से आपका इलाज चल रहा है इतना दर्द तो होगा ही बीमारी जो है। लेकिन आपने असहनीय दर्द को सहन किया। हम तो केवल दर्शक या श्रोता मात्र बनकर रह रहे थे। लेकिन आपने इस वक्त स्वयं का कम और हमारा ज्यादा महत्व रखा।

आपकी ग्रह दशा शांत करने के लिए 3 दिवसीय रुद्राभिषेक भी घर पर किया। भागवान राम का अखंड रामायण का पाठ भी आपने सुना, सभी परिचित उस दिन हवन के मौके पर आपसे भी मिले मुझे खुशी थी कि आपके परिचित लोग आपसे मिलें बातें करें और आपको अच्छा लगेगा। और आपको अच्छा लगा भी। आपके पुराने मित्र भाई भी आपसे मिलने आये शायद उनसे भी अंतिम मुलाकात रही दोनों पक्षों की।

आप आज भी कहीं जाने के लिए तैयार होते थे तो किसी 30 वर्षीय लड़के की भांति लगते थे।
हल्का वजन, लंबा कद काठी।

मेरी अज्ञानता थी या पिता को बचाने के प्रयास में सकारात्मक विचार रहे कि मैं घर मे और दोस्तों को सबको यही कह रहा था कि पापा जी ने ठीक होना है। न जाने कैसे कहीं भी निराशा न मिली थी आजतक आपके सेवा में। हर जगह आशा मिली थी केवल इस बड़ी घटना को छोड़कर कि आप नही रहे, न जाने मुझे कितना समय लगेगा अभी यह स्वीकार करने मे कि पापाजी आप का यह शरीर हमे छोड़कर चला गया। हम पापा किसको कहेंगे??
कोई पूछेगा तो किस मुंह से कहेंगें कि पापाजी नही रहे अब?!
पिता की जगह कोई नही ले सकता

तेजी से समय बीतता गया अचानक 15 फरवरी से आपका तरल खाना
( खाने की नली तो बन्द हो चुकी थी तो केवल छानकर ही हर चीज दे रहे थे) कम हो गया था शायद आपको अनुभव हो रहा था कि आप हमें छोड़कर जाने वाले हैं। 23 फरवरी बाद तो दिमाग ने भी सही से काम करना बन्द कर दिया था आप कुछ भी बोल रहे थे किसी को कभी कभार पहचान भी नही रहे थे। और सुखद यह था कि इन 7 से 8 दिनों तक आप दिमागी रूप से कमजोर होने के कारण अपनी बीमारी भूल चुके थे।और आपको दर्द महसूस नही हो रहा था।
लेकिन अंदर ही अंदर न जाने क्या बीत रही थी आप पर आप ही जानते थे!!? आप आधी रात में अपनी ही सुध में छत पर घूमते,स्वयं दरवाजा खोलते बन्द करते और हमसे कहते कि चलो चलना है मैं तैयार ओ गया हूँ। हम कहते कि पापा अभी खाना खाकर चलेंगे तो पापा कहते ठीक है। और आप अपने खाट में बैठ जाते कभी लेटते। बेचैनी तो थी ही। 1 मार्च की रात्रि में आपने दोनों भाइयों के आने पर चाय बनाने के लिए नीचे रसोई में आये आपने आग जलाई जिसमे मैं आपके सामने रहा कि कहीं खुद को नुकसान न पहुंचा दें क्योंकि दिमाग अब सही नही था। कुछ देर आप चूल्हे के पास बैठ कर आग सेकते रहे। फिर 1 छोटा गिलास कच्चे दूध का आपने पिया, फिर आप बोले कि चल ऊपर मेरे कमरे मे मैं आपको पुजा स्थल नर्सिंग भगवान के कमरे मे ले गया वहां आपको खाट में लेटाया, पापा बोले कि वहां टोर्च दिखा क्या है? मैंने कहा कुछ नही है फिर बोले अच्छा अच्छा , फिर मुझसे पूछा कि तेरा रिश्ता किसने करवाया,मैंने कहा पापा जी आपने करवाना है अभी नही हुआ,आप बोले कि हाँ ठीक है।

अच्छा आपका फोन, टोर्च लेकर चिंतित रहना भी हमे याद रहेगा।

फिर मैं पापा को रसोई में इस बहाने से लाया कि उनका ध्यान बंट जाएगा कि पापा चलो वह रसोई में क्या कर रहे हैं देखते हैं चलकर, पापा उठकर चल दिये हम रसोई पहुंचे वहां पापा अपने आप बोलने लगे कि और कितने लोग हैं खाने वाले मैने कहा हम 5 ही हैं,पापा बोले नही और भी हैं हम चुपचाप हाँ में हाँ करते रहे।
पापा की रोटी तो सितंबर से छूट चुकी थी उन्होंने अब पूछा कि क्या बनाया हमने कहा बैंगन का भरता रोटी, पापा बोले कि लाओ मेरे लिए भी।
मैंने अपने हाथ से रोटी में ही सब्जी रखकर पापा के हाथ मे दी पापा ने रोटी तोड़कर मुंह मे रखा 6 महीने बाद पापा रोटी खाना, नाम तक भी भी भूल चुके थे। दांन्त तो कीमो के। लिए निकाल दिए थे।उन्होंने बिना दांत के रोटी चबाई और थूक दी। मैंने दाल का सूप पापा को खाने को दिया पापा ने मना किया,मैंने पापा को कहा पापा जी इसको पिओगे तो 500 रुपये दूंगा,पापा हंसकर बोले इतने में क्या होगा!? फिर मैने कहा 1000 दूंगा, पापा फिर हंसे बोले कि यह तो बहुत ज्यादा है। अब पापा कहे कि चल यार चलना है देर न करो मैं उनका हाथ पकड़कर ऊपर कमरे मे ले जाने लगा, मैंने घर के ऊपर श्री राम के झंडे की तरफ इशारा करके पूछा झंडा किसका है?
पापा बोले कि श्री राम का। फिर पापा अंदर कमरे में चले गए,आप रात भर सोए नहीं बेचैन रहे कभी छत पर घूमते कभी दरवाजा खोलते,

भगवान श्रीराम की कृपा रही कि हनुमान जी ने आपको आधी रात में दर्शन दिए।
शायद ईश्वर को भी अपने भक्त को आशीर्वाद देना था। और आपको इस लाइलाज बीमारी से मुक्ति देनी थी। सुबह 7 बजे मैंने आपको दवाई पिलाई, फिर मैंने साढ़े 7 बजे तुलसी की चाय आपको पिलाई,
मैंने कोटद्वार जाना था तो मां को कहा कि पापा को सोने देना 10 11 बजे बाद दूध दे देना।
आधे रास्ते कांडी में जाते ही फोन आया कि सब कुछ खत्म हो चुका हैं।

आपने स्वयं ही कष्ट झेला। अंतिम 7 8 दिनों से अपना दर्द भूल चुके थे। आपने हमे बिल्कुल भी सेवा का मौका न दिया, आप स्वयं ही परेशानी झेलकर हमे इस दुःख से दूर रखते रहे।

आपने दुनिया मे किसी को कष्ट नही दिया।

आप ईश्वर रूप में मेरे पिताजी रहे पापा।
धन्य हो गए हम कि आपकी सन्तान रूप में हमारा जन्म हुआ।

एक अदृश्य वास्तविकता यह भी है आर्थिक रूप से कमजोर ब्यक्ति को हर जगह कमजोर समझा जाता है और और बिना किसी वजह के ताने भी हमारे समाज मे दिए जाते हैं लेकिन इन्होंने समाज के तमाम अपनी परेशानियों का बिना किसी को बताए हुए शांति पूर्वक सबको सुनकर ताने बाने झेलकर अपना परिवार मजबूत किया। आपके मित्र समय समय पर आपकी मदद भी करते रहते थे।आज इनके संस्कार ही हैं कि बच्चों को किसी भी स्थान पर परेशानियां नही आती हैं पिता जी का नाम लेते ही अधिकांश लोग इनसे परिचित हैं।
पिताजी आप उस मशीनरी की तरह रहकर परिवार के लिए रास्ता बनाकर चले जैसे कोई नया रास्ता बनाने में भारी भरकम बुल्डोजर मशीन कठोर चट्टान, दलदल,पुराने मलबे को हटाकर अपने पीछे चलने वाले वाहनों के लिए रास्ता बना जाता है, ठीक उसी प्रकार आप अपने परिवार के लिए आप ने अपना सर्वोच्च न्योछावर किया,आज आप के परिवार को आप पर गर्व है कि आप एक सच्चे इंसान रहे कभी कच्चा लालच नही किया, बच्चों को भी कहते थे कि कच्चा लालच नही करना।
परिवार को दुःख है कि आप अल्पावधि में मात्र 63 वर्ष की आयु में ही हमे छोड़कर चले गए।

जब आपके सुख देखने के दिन थे तब ईश्वर ने आपको हमसे छीन लिया, अब आपके बच्चे पापा जी किसको कहेंगे!?

अब सुदीप को हर दिन दोनों समय सुबह शाम फोन कौन करेगा कि सुदीप कहाँ है और आज का कार्यक्रम कहाँ का है।किसी भी काम मे मेरी सलाह लेना और मेरा आपसे सलाह लेना।
हर जगह परछाई की तरह आप मेरे साथ एक सहारा थे। आपसे मेरी हर एक बात शेयर होती थी आप भी मुझसे हर बात कहते थे।
शायद कोई शक नही है कि आप मेरे अंदर ही हर बात जानते थे और मैं आपके मन की की आपको ही जानता था।
एक दूसरे के पूरक थे हम दोनों।

शायद पिता पुत्र का इस से बड़ा क्या सौभाग्य रहा होगा कि दोनों एक दूसरे की पूरक थे। आपको मेरी जेब की चिंता रहती थी और मुझको आपकी जेब की। अब मैं हर महीने किसके खाते में पैसे ट्रांसफर करूँगा?

आपने भूखे प्यासे रहकर भी ऐसा महसूस नही होने दिया कि आप भूखे हैं। कितनी बड़ी शक्ति थी आपके अंदर या लड़ने की क्षमता थी यह।

पिताजी आपने प्राथमिक शिक्षा पहली कक्षा से 5 वीं तक बींजाखेत प्राथमिक विद्यालय में पूर्ण की उसके बाद दिउली इंटर कॉलेज में 9 वीं तक फिर 10 वीं से बारहवीं तक रामनगर संस्कृत विद्यालय ऋषिकेष में शिक्षा अर्जित की। फिर कुछ छोटे मोटे काम भी आजीविका के लिये किये।
ग्रामीणों की वृद्धा वस्था पेंशन, अंत्योदय पेंशन लगाने में पत्राचार में मदद करते थे। सबको मालूम है कि कई असहाय लोगों की मदद की हुयी है आपने।

पिता जी ने ग्रामांचल पत्रकार एसोसिएशन के साथ कई वर्षों तक काम किया। श्री नागेंद्र रतूडी ताऊ जी ही आपको पत्रकारिता के साथी गुरु रहे।इसके साथ उत्तर उजाला समेत कई अखबारों में अपनी लेखनी से क्षेत्र की समस्याओं को सरकार के सामने लाने का काम किया करते थे। 1989 में आकाशवाणी नजीबाबाद से पौराणिक मन्दिर नीलकण्ठ महादेव का वर्णन करना इनको जीवन सबसे अधिक प्रभावित कर गया था,और आप कहते थे कि मुझ पर और मेरे परिवार पर भोलेनाथ का आशीर्वाद है। यह आपने बिल्कुल सही कहा था आज भगवान भोले नाथ की कृपा के प्रमाण इनके घर मे दिखते हैं। यही कारण रहा कि स्थायी रोजगार न होने के उपरांत भी अपने तीनो बच्चों को शिक्षित कर गए, सभी अपने अपने कामों में लगे हुए हैं। इस से बड़ा 1 पिता क्या कर सकता था!

आपने अपनी पढ़ायी की समाप्ति के समय ही राज्य जो पहले उत्तर प्रदेश था उस से पृथक प्रदेश उत्तराखण्ड की मांग जोरों पर थी, अब साथियों समेत उस आंदोलन में भाग लिया, इस आंदोलन के समय जब पुलिस आंदोलन कारियों को पकड़ कर जेल में बंद कर रही थी तो आप भी आंदोलन कारियों के साथ जेल गए। लेकिन जब अलग राज्य उत्तराखण्ड 2000 में बना तो अलग प्रदेश की मांग करने वाले लोग, संगठन, गढ़वाल की जनता और सभी आंदोलनकारियों में खुसी की लहर थी।
इस तरफ राज्य आंदोलन कारियों के लिए सरकार ने नौकरी,पेंशन,बसों में मुफ्त यात्रा सहित तमाम सुविधाएं देने घोषणा कर दी थी। अब लोग अपना जेल में बंद रहने का प्रमाण और LIU पुलिस की रिपोर्ट ढूंढने लगे थे और उसको DM कार्यालय जमा करने लगे थे। लोगों का काम भी हुआ।

शायद किस्मत में नही था कि पिताजी के पास उस समय के सभी प्रमाण जैसे LIU पुलिस रिपोर्ट भी थी कि वह आंदोलन का हिस्सा रहे हैं अन्य विभिन्न राज्य आंदोलनकारियों के रजिस्टर में भी नाम हर अंकित था, लेकिन इनका नाम राज्य के आंदोलनकारी ब्यक्ति में शामिल कराने में तमाम प्रयास विफल रहे।
न जाने पौड़ी के कितने चक्कर भूखे प्यासे रहकर लगाए थे,लेकिन परिणाम शून्य रहा, आप की आर्थिक स्थिति इस समय सही नही थी बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे उनकी फीस,कपड़े,किताबें सभी जिम्मेवारियां थी तो धन का भी अभाव था ऐसा कोई स्थायी रोजगार या धन का संसाधन नही था, पिताजी बताते थे कि यदि पैसा होता तो उस वक्त कई बड़े (आंदोलनकारी नेता) पैसा लेकर लोगों का नाम राज्य आंदोलनकारी में जोड़ रहे थे, परन्तु इन्होंने एक तरफ धन के अभाव में और दूसरी तरफ यह कि हम तो इस आंदोलन का हिस्सा रहे हैं भला हम क्यो किसी को पैसा दें!।
और स्वयं अपने राज्य आंदोलनकारी दोस्तों 3 मुख्य दोस्त थे नागेंद्र प्रसाद रतूडी,इंद्रदत्त शर्मा (रैजा भैया) महेंद्र सिंह रावत के साथ मिलकर पौड़ी आना जाना करते थे। क्योंकि इन तीनो ब्यक्तियों को मालूम था कि तुलसीराम इस आंदोलन में हमारे साथ हर जगह रहे थे,और तमाम सबूत आज भी हैं आप तीनो ब्यक्तियों ने पिता जी की मदद भी की थी।
आज भी राज्य आन्दोलनकारी लिस्ट DM पौड़ी कार्यालय में 117 नम्बर पर तुलसीराम नाम अंकित हैं। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार के राज्य आंदोलनकारियों के प्रति निराशावादी रुख रहकर आज वह लिस्ट सरकार के पास है और कई आंदोलनकारियों का सरकारी सिस्टम से लड़ते लड़ते स्वर्गवास भी हो चुका हैं।

आप हमेशा याद रहेंगे। याद किये जायेंगे।



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