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तांडव पर तांडव जरूरी क्यों ?

लेख-अशोक क्रेजी(पत्रकारिता स्नात्कोत्तर)

लेखक

अभी हाल ही में प्रदर्शित वेवसेरीज़ तांडव में हिंदू देवी देवताओं का उपहास उड़ाया गया है।जिससे समस्त देश भर में हिन्दू जनमानस में आक्रोश व्याप्त है।
इतिहास गवाह है कि समय समय पर बॉलीवुड में विशेषकर ऐसी फिल्मों का निर्माण किया जाता रहा है जिससे हिन्दुओ की धार्मिक भावनाएं आहत हो। pk व omg जैसी फिल्में इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।फिल्में भी कही न कहीं समाज का दर्पण के समरुप कार्य करती हैं।लेकिन बम्बईया फिल्में समाज को सुधारने के बजाय समाज मे अपसंस्कृति को प्रचारित प्रसारित कर रही है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मात्र हिंदू देवी देवताओं का उपहास करना ही इनका एक मात्र उद्देश्य है।बात मात्र हिंदू धर्म की ही नही है।अन्य धर्मों की भी है लेकिन अगर किसी भी धर्म को मात्र नीचा दिखाई जाने की मंशा से कोई फ़िल्म बनाई जाती है तो उसका पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।
कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी ऐसी फिल्मों व रचनाओं को अभिव्यक्ति की आजादी कहकर इनका समर्थन करने की बात करते है।वे रंगे सियार धीरे धीरे समाज में बेनकाब हो रहे हैं।क्योंकि उनकी तुष्टिकरण की नीति समय समय पर जगजाहिर हो चुकी है।अब समय आ चुका है ऐसे लोगो को पलट कर मुह तोड़ जबाब दिया जाए।एक बॉलीवुड के नायक ने अपने नवजात शिशु का नाम एक अत्याचारी और लुटेरे आक्रमणकारी के नाम पर रखा जिसका नाम इतिहास में क्रूर शासक के रूप में प्रसिद्ध है।इससे उस टूच्चे हीरो की मानसिकता का पता लगता है।ये तो ऐसा ही है कि जैसे कोई हिंदू अपने बेटे का नाम कंस रख दे।
ऐसे फिल्मी सितारों से समाज को किसी नैतिक शिक्षा की व सामाजिक सदभाव की उम्मीद भी नही रखनी चाहिए।अगर देश मे सामाजिक सदभाव जीवंत रखना है तो ऐसे धूर्तों का पुरजोर तरीके से विरोध किया जाना चाहिए।इस प्रकार के कृत्य करने वाले लोगों को दंडित किया जाना चाहिए।जो अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए इस प्रकार के जाल बुनते है।ऐसा हथकंडा अपनाते हैं जिससे समाज मे बैर बढता है।
मेरी दृष्टि में तांडव पर तांडव जायज है।

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार है।-संपादक)

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