ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रतीक है बसंत पंचमी


लेख-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी

माघ शुक्लपक्ष की पंचमी का हिन्दू व उससे उत्पन्न अन्य धर्मों में बड़ा महत्व है। प्रकृति में भी अनेक परिवर्तन दिखाई देते हैं। यह बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है कहते हैं देवी रति व कामदेव के पुत्र बसंत का जन्म इसी दिन हुआ था जिससे पूरी प्रकृति प्रफुल्लित हो जाती है,पेड़-पौधे नयी कोंपलों व पुष्पों से भर जाते हैं हवा में मादकता भर जाती है। तापमान समशीतोष्ण हो जाता। मनुष्यों,पशु-पक्षियों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ जाता है।
कवियों ने बसंत पर अनेक रचनाएं की है वेदों पुराणों,संस्कृत हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य बसंत के गुणगान से भरे पड़े हैं। कामदेव के पांच बाण(शब्द,स्पर्श,रूप,रस,गंध) संसार को अभिसार का निमंत्रण देते हैं। प्राचीन काल में मदनोत्सव मनाये जाने की प्रथा हमारे देश में थी।जिसमे युवक युवतियांअपना जीवन साथी चुनती थीं।

“प्रणो देवी सरस्वती वाजिभर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु”

ऋग्वेद के इस श्लोक के अनुसार देवी सरस्वती परम चेतना हैं ये हमारी बुद्धि,प्रज्ञा और मनोवृतियों की रक्षक हैं।हमारे आचार व बुद्धि का आधार भगवती सरस्वती हैं इनके ज्ञान का भण्डार अद्वितीय है। देवी सरस्वती का अवतरण बसंत पंचमी को हुआ था।

पुराणों के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तो रचना बहुत सुन्दर थी पर तब स्वर नहीं था। चारों ओर मौन छाया रहता था इससे ब्रह्मा जी को लगा कि कहीं कुछ कमी रह गयी है। वे इसका समाधान चाहते थे जब वे इसका समाधान नहीं खोज पाये तो उन्होंने विष्णु जी का आवाह्न किया ।विष्णु जी प्रकट हुए। वे ब्रह्मा जी के मन की बात जान गये।विष्णु जी ने आदि शक्ति माता दुर्गा का आवाह्न किया।भगवती दुर्गा ने विष्णु जी के मन की बात जानकर अपने तेज से एक श्वेत वस्त्रधारी सुकोमल नारी को प्रकट किया। चार हाथों वाली इस नारी का एक हाथ वर मुद्रा में था दूसरे में वीणा,तीसरे में स्फटिक की माला व चौथे में पुस्तक थी।उस तेजस्वी नारी ने प्रकट होते ही वीणा के तारों से नाद(स्वर) उत्पन्न किया। देवी महादुर्गा ने ब्रह्माजी से
कहा-“ब्रह्मन ज्ञान व स्वर की देवी यह नारी सरस्वती के नाम से जानी जाएगी । इसे अपनी पत्नी बनाओ अब से तुम जो रचाना करोगे उसमें यह ज्ञान व चेतना भरेंगी।” बसन्त पंचमी के दिन प्रकट होने के कारण यह दिन उनके प्रकटोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन जो पतंग बाजी की जाती है उसका सरस्वती जी के जन्मदिन से या बसन्तपंचमी के कोई सीधा संबंध नहीं है। न जाने कब से यह प्रथा इस पर्व पर जुड़ गयी है।

 बसंत पंचमी का संबंध होली से हैं इस दिन  जिस स्थान पर होली जलाई जाती है उस स्थान पर होली का झंडा फहराया जाता है यह होली के प्रारम्भ का संकेत भी है तथा इसका संबंध राधा व कृष्ण से भी जोड़ा जाता है।कहते हैं द्वापर में श्रीकृष्ण व राधा जी ने एक दूसरे पर गुलाल लगाया था। तब से बसंत पंचमी पर गुलाल लगाने की प्रथा चली आ रही है।ब्रज में होली का शुभारम्भ इसी दिन होता है।

बसंत पंचमी का हमारे इतिहास से भी संबंध है। महान राजा भोज का जन्मदिन भी बसंत पंचमी को ही माना जाता है इसके अलावा अंतिम हिन्दू सम्राट राजा पृथ्वीराज चौहान ने इसी दिन गजनी में मुहम्मद गोरी का वध किया था वीर हकीकत राय का कत्ल इसी दिन हुआ था। सिक्खों के अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह जी का विवाह इसी दिन हुआ था।
पहाड़ों में बसन्त पंचमी को कई स्थानों पर मेला लगता है,गीत गाये जाते है। पहले गांव के आवजी सुबह -सुबह जौ के हरे पौधे कच्ची हल्दी व थोड़ा सा गुड़ अपने वृत्ति क्षेत्र में प्रत्येक घर में देते थे जिन्हें घर वाले पूज कर गाय के गोबर से अपने चौखट के ऊपरी दोनों किनारों पर चिपकाते थे।इसके अलावा अनाज रखने के दबले या कोठार पर चिपकाते थे। यह जहां आवजी की अपनी वृत्ति के लोगों के हरे भरे रहने की कामना होती थी वहीं परोक्ष रूप से प्रकृति की पूजा होती थी। परन्तु अब यह प्रथा कम ही देखने को मिलती है।हिन्दू विद्वान व विद्यार्थी वर्ग इस दिन विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा करते हैं।
वास्तव में बसंत पंचमी बसंत के आगमन का प्रतीक है।जिसकी अन्तिम चरम होली को होता है जो एक प्रकार से उल्लास,उमंग व उन्माद का पर्व है।बसंत पंचमी मानव मन में नयी चेतना व उल्लास जगाता है।
हमारे पाठकों को बसंतपंचमी की शुभकामनाएं।

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