उत्तराखण्ड में पलायन नहीं स्थान परिवर्तन होता है।स्थान परिवर्तन के कारण व निवारण। -नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ीwww.Janswar.com

उत्तराखण्ड में पलायन नहीं स्थान परिवर्तन होता है।स्थान परिवर्तन के कारण व निवारण।

-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी                               राज्य मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार                   राज्य आन्दोलनकारी

 

पलायन का शाब्दिक अर्थ है भागना जैसे  किसी स्थान से भागना।यह पलायन युद्ध,संक्रामक रोगों,प्राकृतिक आपदाओं या अन्य मुसीबतों के समय अपने स्थान को सदैव के लिए छोड़ना होता है।उदाहरण के लिए सन् 1947 में पाकिस्तान से वहां से हिन्दुओं का भारत आना।बंग्लादेश की लड़ाई मे वहां के नागरिकों का भारत आना। कश्मीरी पंडितों का अपना गाँव,शहर छोड़ कर भारत के अन्य शहरों में जा कर रहना।कोविड-19 के प्रारंभ में मजदूरों का अपने कार्यस्थल छोड़ कर अपने घरों को जाना।पलायन उस अवस्था में होता है जब  मनुष्य वहीं रहना चाहते हों पर परस्थितियां वहां ऐसी हों कि अगर वह वहां रहे तो उसकी या परिवार की जान जा सकती है।जीवन की विरुद्ध परस्थितियों में अपना स्थान छोड़ कर भागने को पलायन कहा जाता है।यदि             पलायनकर्ता दूसरे देश में जाता है तो शरणार्थी कहा जाता है स्थान छोड़ने का एक दूसरा स्वरूप है। जिसे पलायन कहना किसी भी दशा में उचित नहीं कहा जा सकता है।यह है कि सुख सुविधाओं व अधिक उन्नति के लिए अपने स्थान को छोड़ना।ऐसा परिवर्तन जो स्व इच्छा से बिना किसी विवशता के करते हैं।जैसे गाँव का एक व्यक्ति पैसे कमाने के लिए किसी महानगर में जाता है।धीरे-धीरे वह वहाँ धनसंपत्ति जोड़ देता है। और परिवार सहित वहीं रहने लगता है।दूसरा उदाहरण अगर कोई पैसे वाला व्यक्ति  शहर में जमीन खरीद कर मकान बनाकर गाँव  छोड़कर सुविधाओं के लिए शहर में रहना शुरू कर देता है तो उसे पलायन नहीं कहा जा सकता।इसे तो स्थान बदलना कहा जा सकता है।इस उदाहरण को इस प्रकार भी समझा जा सकता है।मान लीजिए दो व्यक्ति अ व ब हैं। गाँव में रहते हैं।अ को किसी महानगर  में अच्छी नौकरी मिल गयी है।वह अपना परिवार ले जाकर वहां बस जाता है तो यह पलायन न हो कर स्थान परिवर्तन है।इसी प्रकार ब का गाँव भूस्खलन की चपेट में है और वह वहां से नहीं जाता  तो उसका मकान भूस्खलन की चपेट में  आकर जान माल का नुकसान कर देगा ऐसे में वह  अगर वह अपना सब कुछ छोड़ गाँव से कर जान बचाने भागता है तो यह पलायन है।पहाड़ से जो तथा कथित पलायन है वह पलायन तो बिल्कुल नहीं है।क्यों कि जितने भी लोग पहाड़ छोड़कर शहरों या दूसरे महानगरों में बसे हैं वे स्वेच्छा से रोजी रोटी कमाने गये और वहीं बस गये। कुछ लोग नौकरी से सेवानिवृति  के बाद शहरों में जमीन लेकर बस गये।ऐसे स्वेच्छा से गाँव छोड़ कर जाने वाले लोगों ने पलायन तो बिल्कुल नहीं किया । मेरी नजर में ऐसे लोगों ने स्थान परिवर्तन किया है।अभी तक पहाड़ों से पलायन नहीं हुआ है। जो भी गया है स्वेच्छा से गया है।हाँ अगर सरकार व प्रशासन के द्वारा पहाड़ी गाँवों की ऐसी ही उपेक्षा की जाती रही तो वह दिन दूर नहीं जब पहाड़ी गाँवों से पलायन होना शुरू हो जाएगा।इसका पलायन के निम्न कारण हैं।
1-गुलदार– गुलदारों की संख्या बढने से वे दिन-रात बस्तियों के निकट रहने लग गये हैं गांवों में स्वेच्छा स्थान परिवर्तन करने वालों के कारण गांव में जो बची आबादी है वह बहुत कम है।खेती न होने के कारण खेतों में गाजर घास,कुरी(लैंटाना)ने सब ओर अपने पैर फैला दिये हैं।इन झाड़ियों के कारण उसका वास गाँव के निकट हो गया है।अकेले आदमी को देख कर वह दिन दोपहर उस पर हमला करने का साहस कर देता है। वन विभाग को उन्हे पकड़ने को कहो तो वे ध्यान नहीं देते हैं।सुना है कि दिल्ली से वापस गाँव बसने आयी दुगड्डा के निकट गोदी गाँव की 38 वर्षीय महिला को दुगड्डा के घर जाते समय दिन दहाड़े गुलदार ने मार दिया।इससे पहले पौड़ी की एक महिला अपनी गाय ढूंढने गयी उसे गुलदार ने मार डाला,एक व्यक्ति अपने खेत में काम कर रहा था घर से आधे किमी दूर।गुलदार ने उसे मार डाला।देवप्रयाद के निकट एक महिला शाम को बरतन मांज रही थी गुलदार उसे उठा ले गया।गत वर्ष डाडामंडी क्षेत्र में कोटद्वार जाने को निकली प्रौढ महिला को गुलदार ने दिन दहाड़े  सड़क में मार डाला।गांव वासियों के पशुओं को वह दिन दहाड़े लोगों के सबके सामने ही उठा लेता है।ऐसी स्थिति में गांव वाले न खेती कर पा रहे हैं न पशुपालन। वन विभाग उसी की सुनता है जो पहुँच वाला हो।आम आदमी के कहने पर भी पिंजरा नहीं लगाते।अब दिन में अकेले आदमी का इधर उधर जाना बन्द हो गया है।सूर्य ढलते ही घर के अंदर रहना नियति हो गयी है।
2-अन्य जंगली जानवर– अपने वन के सत्तर साल में पहली बार मेरे गाँव के निकट के गांव तिमल्याणी में जो कि मेरे गाँव की तरह नितांत पहाड़ी है,में मैंने पहली बार इस गर्मियों में सुना कि वहाँ हाथियों का झुण्ड घुस गया।जब कि उनके निवास में कोई मानवीय हस्तक्षेप नहीं है। गांवों में बन्दरों,लंगूरों का इतना उत्पात है कि बन्दर घर के अन्दर की रोटी तक ले जाते हैं।ये बंदर इतने ढीठ हैं कि भगाने पर आदमी पर ही झपट पड़ते हैं। ये बन्दर फसल की छोटे पौधे को फाड़ कर उसके अंदर की कोंपल,सब्जियों को,सब्जियों की बेलों की कोंपलें फलदार वृक्षों के फलों को तो खाते ही हैं पेडों की टहनियां भी तोड़ डालते है।उनको भगाने के लिए जाने वाले कुत्तों की वे पिटाई कर देते हैं।कुछ लोग कहते हैं ये बंदर व लंगूर कुम्भ के समय हरिद्वार ऋषिकेश व आस-पास के बंदर पकड़ कर यहां गांवों  के निकट छोड़ दिए गये हैं। सच जो भी हो पर से गाँव वालों के लिए गांव वाले वन विभाग को बन्दर पकड़ने को कहते हैं तो उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।जब कि इन बन्दरों ने उसका जीना मुश्किल कर रखा है।                  इसके अतिरिक्त साही,सुअर,मोर,तोते फसलों को बरबाद कर देते हैं।चकबंदी न होने पर अलग अलग स्थानों पर होने खेतों की सुरक्षा नहीं कर पाते। ये सब  राज रक्षित हैं इसलिए इन्हे मारा भी नहीं जा सकता।इसलिए लोगों ने खेती करना छोड़ दिया।बंजर खेतों मे लैण्टाना,गाजर घास और काली घास कब्जा कर लेती है।जिससे जानवरों को आश्य मिल जाता है।
3- असमान विकास कार्य-गाँवों में विकास कार्य न के बराबर है हर साल रास्ते की झाड़ी कटान,गड्ढा खुदान।सरकारी योजना किसी को तो एक बार भी नहीं मिलती और किसी को बार बार मिल जाती है। खुली बैठक में रखे प्रस्तावों पर काम न होना।यातायात की सुविधा न होना।कई गाँवों को सड़क से वंचित रखना। जिन गाँवों में सड़क हैं भी वे अधिकतर कच्ची हैं। सड़क तो हैं पर उन में यातायात के साधन नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात निजी हाथों में है।उत्तर प्रदेश के जमाने में जिन सड़कों पर रोड़वेज चलती थी  राज्य बनने के बाद वे  बन्द कर गयीं।आदमी टैक्सी कारों के भरोसे है। चिकित्सालय भी दूर दूर हैं जहाँ सड़कें नहीं हैं वहाँ रात को अगर किसी की तबियत खराब हो गयी तो क्या विकल्प है। 108की सेवा भी उपलब्ध नहीं हो सकती।बिजली की अघोषित कटौती होती रहती है दिन में दस से पन्द्रह बार तो कटौती हो ही जाती है।
अधिकारियों का जनता की न सुनना-कुछ अधिकारियों को छोड़ कर अधिकांश अधिकारी अपना मोबाइल ही नहीं उठाते।अगर किसी ने उठा भी लिया तो पूरी बात नहीं सुनते और फोन काट देते हैं।ऐसे में जनता अपनी समस्या किससे बताए।
4-जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा– जनप्रतिनिधि भी अपनी निधि का वितरण समान रूप से नहीं करते।पार्टी के आदमी को देख कर निधि का वितरण होता है।एक ग्राम सभा में मुख्य गाँव को छोड़ कर अन्य खण्ड ग्रामों को सोलर लाईट दे दी गयीं।जिस व्यक्ति ने यह लाईटें बांटी हैं जब उससे पूछा गया कि तुमने मुख्य गाँव को सोलर लाईट क्यों नहीं दी तो सत्ता पार्टी के उस कार्यकर्ता ने कहा कि इस गाँव के लोगों ने उसे प्रधान चुनाव के समय वोट नहीं दिया। ऐसी स्थिति में लोग गाँव में किस प्रकार रह सकते हैं।
कैसे रुकेंगे लोग गाँवों में- लोग गाँवों में रह सकें इसके लिए सरकार को  कुछ उपाय करने पड़ेंगे। अन्यथा वह समय दूर नहीं है जब  गाँव के लोग समूह में गाँव छोड़ने को विवश हो जाएंगे।जिला इकाइयों को छोटा किया जाय ताकि जनपदीय अधिकारी गाँव तक पहुँच सकें या गाँव के लोगों की पहुँच उन तक हो सके। सबसे पहले तो लैण्टाना गाजर घास व काली घास के उन्मूलन  किया जाना चाहिए।इसके लिए सभी ग्राम सभाओं को बजट मिले। इन झाड़ियो के उन्मूलन का एक ही तरीका है कि इनके जड़ सहित खोदा जाय। जिस गाँव की सीमा में यह झाड़िया हों उस गाँव व ग्राम सभा पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए।इसे मनरेगा से भी जोड़ा जा सकता है।             वन्य पशुओं पर समय से नियंत्रण हो । सभी गांवों में यातायात व्यवस्था हो सभी गाँवों में सोलर लाईट लगी होनी चाहिए,प्रत्येक गाँव में कम से कम एक बंदूक का लाईसेंस दिया जाना चाहिए ताकि जानवरों को फायर से भगाया जा सके या सरकार को सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान में उच्चध्वनि वाले पटाखे उपलब्ध कराने चाहिए। प्रत्येक गाँव में सोलर विद्युत प्रवाह वाली तारबाड़ लगायी जानी चाहिए। बरसात में व बरसात बाद हर वार्ड मेंबर को रास्ता साफ करने के लिए सीधे धनराशि दी जानी चाहिए।अधिकारियों के कैम्प कार्यालय समाप्त होने चाहिए। उनको अपने मुख्यालयों में रहने की बाध्यता हो।लोकपाल जैसी कोई ऐसी संस्था बने जो लोगों की समस्याएं सुन सके और अधिकारियों कर्मचारियों के अपने कार्यस्थल  में रहना सुनिश्चित कर सके। जमीन की चकबंदी हो। ताकि लोग चक में खेतों की सुरक्षा कर सकें। और अब तो बूढे व महिलाओं के गाँवों में रहने के कारण किसी की मृत्यु पर शव को श्मशान घाट ले जाने वाले नहीं मिलते इसलिए हर न्याय पंचायत पर शव ढोने वाले वाहन  होने चाहिए।जो निर्धारित शुल्क पर  उपलब्ध हों।पहाड़ की जमीन बेचने पर प्रतिबंध लगे।तभी लोग इन पहाड़ी गाँव,कस्बों में रहेंगे। वरना वह दिन दूर नहीं जब गाँव के गाँव खाली हो जाएंगे।ऐसे में कोई भी इन गाँवों में घुसपैठ कर सकता है।और देश विरोधी गतिविधि चला सकता है।

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