उत्तराखण्ड में पत्रकारों की दशा खराब। रंगदारी में गिरफ्तार नं.1अखबार का पत्रकार। पढिएJanswar.Comमें।

समाचार प्रतुति- नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी

लगता है उत्तराखण्ड के पत्रकारों की दशा खराब चल रही है।उन पर रंगदारी ब्लेकमेलिंग के आरोप लग रहे हैं।पिछले साल मुनिकीरेती थाने में रंगदारी वसूलने के लिए दो पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज हुआ था। कुछ दिन पूर्व देहरादून के पोर्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
इस साल अपने को नं.1 कहने वाले अमरउजाला के एक पत्रकार को हल्द्वानी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। ताजा समाचार के अनुसार ऋषिकेश प्रभारी महेन्द्र सिंह व उसके कथित साथी ऋषिकेश के होटल व्यवसायी अक्षत गोयल को पुलिस ने मेरठ से गिरफ्तार किया है। पत्रकार पर आरोप है कि उसने एक ठेकेदार से एक लाख रुपये की रंगदारी मांगी। न देने पर जान से मारने की धमकी दी। ठेकेदार ने देहरादून न्यायालय पंचम अपर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना प्रार्थनापत्र दिया जिस पर न्यायालय ने मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया।न्यायालय के आदेश पर पत्रकार के विरुद्ध कोतवाली ऋषिकेश में धारा 156(3)के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया।मुकदमे की जानकारी मिलते ही पत्रकार भूमिगत हो गया जिसको पुलिस ने मेरठ से गिरफ्तार कर लिया।
उक्त घटनाएं बताती हैं कि अब पत्रकारिता का पेशा समाचारों तक नहीं रह गया है।अब वे किसी माफिया की तरह रंगदारी भी मांगने लगे हैं। जो कि पत्रकारों पर कलंक है। अगर वास्तव में पत्रकारों ने रंगदारी मांगी है तो पत्रकारों के नाम पर कलंक ऐसे पत्रकारों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए।
पर तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी होता है जिसमें दिखाया कुछ और ही जाता है और वास्तविकता कुछ और ही होती है।
पाठकों को याद दिला दूँ कि 1988 में अमर उजाला के पौड़ी स्थित पत्रकार स्व.उमेश डोभाल को शराब माफिया ने मार डाला था। उसकी हत्या की जाँच सी.बी.आई.से कराने के लिए हम सभी पत्रकारों ने बोटक्लब पर धरना दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद उसकी सीबीआई जाँच हुई थी।
दिसम्बर 1987 को जब मैं चीला में अमर उजाला मेरठ का रिपोर्टर था तो तब पुलिस ने राजाजी पार्क के चीला रेंज में गंगा नदी में मछली मारते हुए कुछ लोगों को पकड़ा था और उन पर मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया था। मैंने उसका समाचार बनाया।दूसरे दिन रेंज अधिकारी का वर्जन भी छापा।इसके बावजूद भी रेंज अधिकारी ने मुझ पर मानहानि का मुकदमा कर दिया और मुझे जमानत करानी पड़ी थी।संपादक ने इसका रिविजन देहरादून में करवाया।जिसमें समाचार सत्य पाया गया।कहीं भी समाचार में न्यायालय न मानहानि नहीं पायी। तीन साल बाद न्यायालय ने मुझे व संपादक को निर्दोष मानते हुए दोषमुक्त कर दिया था।
उपरोक्त मामलों में सच्चाई जाँच के बाद ही सामने आ पायेगी पर जब तक न्यायालय फैसला सुनाता है तब तक व्यक्ति कई मानसिक यातनाओं से गुजर चुका होता है। यदि पत्रकार रंगदारी का दोषी पाया जाता है तो उसको न्यायालय तो सजा देगा ही पत्रकार समूह तो भी उसका बहिष्कार करना चाहिए

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