आसान नहीं हैं मुख्यमंत्री पुष्करसिंह धामी की राह-वरिष्ठ पत्रकार नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी का लेख।www.Janswar.com

सरल नहीं है मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राह

-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी

चुनावों में हार के बाद भी भाजपा आलाकमान ने उत्तराखण्ड की बागडोर श्री पुष्कर सिंह धामी के हाथ में सौंप दी। शायद आला कमान का यह मानना था कि धामी जी के कुशल शासन के कारण ही भाजपा को 47 सीटें मिली हैं और सत्ता पार्टी दुबारा सत्ता में नहीं आती का मिथक तोड़ कर भाजपा को पुन: सत्ता में बिठाया। यह सत्य भी है। यद्यपि चुनाव के समय के सर्वेक्षण में उत्तराखण्ड में की जनता ने बताया था कि वे अपना वोट प्रत्याशी को नहीं मोदी को दे रहे हैं। जो भी हो पर यह निर्विवाद सत्य है कि उनके नेतृत्व में लड़े चुनाव में ही भाजपा को बहुमत मिला और दुबारा सत्ता मिली। जिसका लाभ उन्हें मिलना ही चाहिए था।

भाजपा ने जब पूर्व मुख्यमंत्री श्री तीरथसिंह रावत के बाद पार्टी के बड़े बड़े चेहरों को छोड़ कर युवा चेहरे पर विश्वास कर श्री धामी को मुख्यमंत्री के रूप में गद्दी पर बैठाया तो और विधायकों ने तो अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की पर दिगज्ज नेता श्री हरकसिंह ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर विद्रोह का झंडा फहरा दिया था।शायद उन्हें यह विश्वास रहा होगा कि उनके विद्रोह में उनके कांग्रेस से आये साथी उनका साथ देंगे पर ऐसा नहीं हुआ और वे अकेले ही भाजपा छोड़ कांग्रेस में चले गये।जहां जाकर उनका राजनैतिक जीवन फिलहाल विराम की अवस्था में है।
अगर श्री धामी चुनाव जीत कर आते तो उनकी नयी ताजपोशी निसंदेह स्वाभाविक लगती परन्तु उनके हारने के बाद भी उन्हें दुबारा मुख्यमंत्री बना देना निसंदेह कई वरिष्ठों को खला होगा। यद्यपि मेरी अभी तक उनसे भेंट नहीं हो पायी।उनके पिछले कार्यकाल में प्रेस के लिए किए आयोजन में मैं सूचना निदेशालय के फोन आमंत्रण के बाद भी उपस्थित नहीं हो पाया था। पर पत्रकार साथियों से पता लगा कि वे बहुत सरल,मिलनसार व जन समस्याओं का तुरंत समाधान करने वाले मुख्यमंत्री हैं।जिससे उनकी लोकप्रियता बढी है।परन्तु राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता अगर होते तो दल बदल नहीं होते।
मुख्यमंत्री धामी जी के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने शासन के अधिकारियों को नियंत्रित करने व उनसे काम लेना है।दूसरा यह कि सरकार जो योजना बनाये वह उन व्यक्तियों तक पहुँचे जिनके लिए योजना बनी है।उनको ऐसी कार्यनीति अपनी चाहिए जिससे निचले स्तर के कर्मचारियों में सही कार्य करने की प्रवृति पनपे।साथ ही उच्च,मध्यम व निचले स्तर के अधिकारियों की व उनके निकट संबंधियों की संपत्तियों की गुप्त जांच समय-समय पर करवायी जानी चाहिए। उत्तराखंड में निर्माण कार्य संस्कृति बहुत घटिया बतायी जाती है कमीशन के नाम पर कम सीमेंट पड़ना,कम तारकोल पड़ना घटिया व निर्धारित मात्रा से कम निर्माण सामग्री का प्रयोग करना।इस सब को रोकने की जिम्मेदारी भी उन पर है।तहसील स्तर के सभी अधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्र में निवास करवाना का प्रयास भी उनके द्वारा होना चाह्ए तथा तहसील स्तर के अधिकारी पका गांव स्तर पर नियमित कैंप कर गांववासियों की समस्याओं का समाधान करना व जंगली जानवरों से जनता की रक्षा करना उनके विजन में होना चाहिए।
मुख्यमंत्री के लिए वे विधायक जिनको मंत्री पद नहीं मिला भी समय-समय पर चुनौती बन सकते हैं तथा वे मंत्री भी जो स्वयं मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं।क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समय ऐसा हो चुका है।इसलिए ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पुन: नहीं होगी ऐसा नहीं कहा जा सकता है।इसके लिए उनको अपने एलआईयू तंत्र में सुधार लाना होगा।उनकी सक्रियता पर पुरस्कार व निष्क्रियता पर उन्हें दण्ड की व्यवस्था भी बनानी चाहिए।एक निश्चित समयावधि में सबके अनिवार्य स्थानान्तरण होने की व्यवस्था भी बनानी होगी तभी कर्मचारी ठीक से काम करेगा।एक ही जगह बरसों बरस से जमें कर्मचारियों /अधिकारियों का स्थानान्तरण करने से उनमें ताजगी आएगी।
अभी तो उन्हें अपनी विधानसभा सीट निकाली होगी चूंकि वे मुख्यमंत्री हैं तो कोई न कोई विधायक उनके लिए सीट छोड़ेगा ही।उनकी कार्यकुशलता तो तब निखरेगी अगर विरोधी दल का कोई विधायक उनके लिए सीट छोड़ दे। वे ऐसा कर सकें तो उनके कई अज्ञात विरोधी तो इससे ही हताश हो जाएंगे और भाजपा की एक सीट बढ जाएगी।
यह तो समय बतलाएगा कि मुख्यमंत्री अपने इस अग्निपथ पर कितनी कुशलता से चल पाते हैं।वे केवल पूर्ववर्तियों की तरह अपना दायित्व केवल निभाते ही हैं या उसको किसी उच्च आयाम तक ले जाकर कीर्तिमान स्थापित करते हैं।

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